समझदारी
कभी-कभी इंसान को किसी दुख की ज़रूरत नहीं होती टूटने के लिए। कभी-कभी सब कुछ ठीक चल रहा होता है—काम, लोग, दिनचर्या—फिर भी भीतर कहीं कुछ लगातार खिसकता रहता है। जैसे ज़िंदगी बाहर से ठोस है, मगर अंदर से रेत। हम इसे उदासी नहीं कहते, क्योंकि उदासी का कोई कारण होता है। यह एक अजीब-सी बेनामी थकान है, जो रूह में उतर जाती है। एक ऐसा सन्नाटा, जो शोर में भी सुनाई देता है।
हम जिन बातों को “समझदारी” कहते हैं, दरअसल वही बातें हमें धीरे-धीरे खोखला करती हैं। समझौते, सब्र, हालात से तालमेल—ये सब ज़रूरी हैं, मगर इनकी एक कीमत होती है। और वह कीमत अक्सर हमारी सच्ची ख्वाहिशें चुकाती हैं। इंसान जब बार-बार अपने दिल की आवाज़ को “अभी नहीं” कहता है, तो एक दिन दिल ही खामोश हो जाता है। फिर न कोई शिकायत बचती है, न कोई उम्मीद। सिर्फ़ एक आदत—जीते चले जाने की।
सबसे खतरनाक बात यह है कि इस हालत में इंसान खुद को मजबूत समझने लगता है। उसे लगता है कि वह अब किसी चीज़ से टूटता नहीं, किसी से ज़्यादा जुड़ता नहीं। मगर सच यह है कि यह मजबूती नहीं, बे-हिस्सी है। यह वह मुकाम है जहाँ दर्द रोना छोड़ देता है और इंसान महसूस करना। रूह पर जैसे एक गर्द जम जाती है—न दिखती है, न आसानी से उतरती है।
हम अकसर सोचते हैं कि वक़्त सब ठीक कर देता है। लेकिन वक़्त सिर्फ़ चीज़ों को ढकता है, ठीक नहीं करता। अधूरी बातें, अनकहे जज़्बात, दबे हुए सवाल—ये सब वक़्त के साथ दब तो जाते हैं, मगर मिटते नहीं। वे भीतर कहीं ज़िंदा रहते हैं, और किसी रात, किसी तन्हा लम्हे में अचानक जाग उठते हैं। तब समझ आता है कि हम जितना आगे बढ़े थे, उतना ही खुद से दूर चले गए थे।
शायद ज़िंदगी का सबसे बड़ा धोखा यही है कि वह हमें सिखा देती है कैसे सहना है, मगर यह नहीं सिखाती कि कैसे खुद के साथ ईमानदार रहा जाए। हम दुनिया के सामने किरदार निभाते-निभाते इतने माहिर हो जाते हैं कि आईने के सामने खड़े होकर भी खुद को पहचानने में हिचकते हैं। और फिर एक दिन एहसास होता है—हम किसी और की उम्मीदों में इतने मशगूल रहे कि अपनी ही ज़िंदगी में मेहमान बनकर रह गए।
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